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सन्देश

मुद्दतें गुज़री तेरी याद भी आई न हमें,
और हम भूल गये हों तुझे ऐसा भी नहीं
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शनिवार, 17 अक्तूबर 2015

अवधेश प्रताप सिंह भदौरिया 'अनुराग'

परिचय:
अवधेश सिंह भदौरिया'अनुराग'
जन्म स्थान -मैनपुरी(उ.प्र .)
जन्म-२८ जुलाई १९७४ ,संपर्क-09555548249, Email: ask180507@gmail.com
गतिविधियाँ-वर्तमान में कर्म स्थली -नई दिल्ली, मैं अपने विद्यार्थी जीवन से ही साहित्य की विभिन्न गतिविधियों में संलग्न रहा|आगरा वि.वि.से लेखा शास्त्र एवं हिंदी साहित्य में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की ,फिल्म निर्देशन व पटकथा लेखन में व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त की |सर्वप्रथम मुंबई को अपना कार्यक्षेत्र बनाया |लेखक-निर्देशक श्री गुलजार के साथ सहायक फिल्म निर्देशक के रूप में कार्य किया|पटकथा लेखन में श्री कमलेश्वर के साथ टी.वी.के लिए कार्य कर दिल्ली वापस लौट आया|तत्पश्चात दिल्ली दूरदर्शन में दूरदर्शन निदेशक डॉ.जॉन चर्चिल,श्री प्रेमचंद्र आर्या के साथ कार्य किया|साथ ही साथ आकाशवाणी आगरा,दिल्ली,नजिवाबाद केन्द्रों से काव्यपाठ एवं नाटक,एकांकी के लिए कार्य किया |२००२ से अपना व्यवसाय करते हुए साहित्यक कार्यक्रमों में मेहमान वक्ता-प्रवक्ता एवं दिग्दर्शक के रूप में स्वतंत्र रूप से सेवारत हूँ। 
==============================
१. 
खुली आँखों से मैं ,जब-जब शहर को देखता हूँ,
बुझे से लोग मिले हैं ,कई टूटे हुए घर देखता हूँ ।

बड़ी रफ़्तार से आगे निकलते,जो लोग अक्सर,
उन्हें भी भीड़ में तन्हा ,अधिकतर देखता हूँ ।

पलटता वक्त जब भी लौटता ,है प्रश्न लेकर ,
हैं चिपके सबके चेहरों पर,मौन!उत्तर देखता हूँ ।

हाल पूछा , चूमकर जलते चिरागों की हथेली,
कहा तो कुछ नहीं उसने , मैं हँसता, देखता हूँ ।

नदी जब भी किनारा छोड़ती है ,सूखती जाती ,
मगर उसका सफ़र हूँ मैं ,रोज़ बेहतर देखता हूँ ।

बदन पर रोशनी तो ढेर सारी,पर जिस्म नंगा है ,
संभालता, आदमी हूँ ,बेख़ौफ़ मंजर देखता हूँ ।

फूल ,गुलदस्ते ,चमेली,रातरानी ,मोगरा भी है ,
ज़मीं’अनुराग’सूखी,घर-घर को बंज़र देखता हूँ ।
२. 

शब्दों की मर्यादा में ,कुछ कहने का साहस करना,े
ऐसा लगता है अंजुली में ,लहराता सागर भरना ।

बस्ती-बस्ती,बच्चा-बच्चा,पत्ता-पत्ता मन भी टूटा है ,
मुश्किल है पर ,मुमकिन उम्मीदों को आँगन करना ।

चटक रहा है सख्त धरातल,सदियों से दोहन के बाद,
लौट रहे हैं फिर सत्-पथ पे,शुब-शुभ परिवर्तन करना ।

सभी दिशाओं में जाना है ,लेकर के विस्तार ,विकल्प ,
रूठे,टूटे , पीछे छूटे है उन सबका संशोधन करना ।

योगिक सा मन,तपस्वी बन ,सबल सारथी आया है,
स्वच्छ,समर्पण,दोष-मुक्त हो,उस पथ का निर्देशन करना ।

विश्व चकित हो सोख रहा ,भारत की गरिमा के रंग ,
उठो सजग हो ,प्राण प्रतिष्ठित ,करके मन अर्पण करना ।

शब्दों की मर्यादा में ,कुछ कहने का साहस करना,े
ऐसा लगता है अंजुली में ,लहराता सागर भरना ।
३. 
ज़िन्दगी ने दिया,फिर दगा दोस्तों,
कोई अपना रहा ना , सगा दोस्तों ।

खो गए रास्ते ,हैं मज़िलें गुमशुदा ,
पाँव फिर हो गए ,बेवफा दोस्तों ।

यूँ तराशा,चटख के बिखरने लगा,
आदमीं तो मिट्टी का,पुतला दोस्तों ।

ठीक मंझधार में छोड़कर नाखुदा,
साथ पतवार भी ले गया दोस्तों ।

अब तो हर सांस ही इम्तहाँ आपका,
ज़हर पी कर चली है ,हवा दोस्तों ।

अब दुआ रंग लाएगी ,सब देखना ,
काम आती नहीं है ,जब दबा दोस्तों ।

मैं उमर भर उन्हें ,प्यार करता रहा ,
जिनसे इक भी दफा,ना मिला दोस्तों ।

दिल कई मर्तबा ,टूट कर जुड़ गया ,
मन दोवारा नहीं ,मिल सका दोस्तों ।

जाने ‘अनुराग’कैसी लगन लग गई,
आज तक इस अगन में जला दोस्तों ।
४. 
टूटकर जब भी, संभलता आदमी ,
और भी ज्यादा ,निखरता आदमी ।

मंजिलों के बाद भी, जो रास्ते हैं ,
उनसे भी आगे, निकलता आदमी ।

तोड़कर चट्टान,जब दरिया चला ,
देख!सागर सा,पिघलता आदमी|

है इरादों की बहुत, लम्बी उड़ान ,
जीतकर अक्सर,गुजरता आदमी|


मिल गई ,बुझते चिरागों को हवा,
लो रौशनी लेकर,चहकता आदमी|

बंद दरबाजों पे,दस्तक फिर हुई ,
खौफ से डरता,सिमटता आदमी|

तोड़कर चट्टान,जब दरिया चला ,
देख!सागर सा,पिघलता आदमी|

है इरादों की बहुत, लम्बी उड़ान ,
जीतकर अक्सर,गुजरता आदमी|

मिल गई ,बुझते चिरागों को हवा,
लो रौशनी लेकर,चहकता आदमी|

बंद दरबाजों पे,दस्तक फिर हुई ,
खौफ से डरता,सिमटता आदमी|
५. 
आंकलन मत कीजिये ,इस वक़्त उस उन्माद का ,
ये सीधा-सीधा, मेरे और तेरे ,बीच का संवाद था ।

तोड़कर सागर किनारा ,घुस गया है बस्तियों में ,
पी गया जो ज़िन्दगी को ,ये कौन सा तूफ़ान था ।

जागरण का दौर है मत सो,अन्धेरा ढूंढ ना ले
मशवरा है आपको, मानना ना मानना ईमान था ।

हो गई जर्जर इमारत ,खंडहर रोशन गुलिस्ताँ,
गर्दिशों के दौर थे ‘कल’हर आदमी बदनाम था ।

महफिले चलती रहीं ,चारो तरफ शानो-शबाब ,
हम तो उनसे भी मिले,जो अपने घर मेहमान था
६. 
आरजू कद से,बड़ी हो जाएगी ,
क्या पता था,ख़ुशी खो जायेगी ।

आइना पत्थर, से जब टकराएगा,
अक्श की शै,सौ गुनी हो जायेगी ।

जल रहे है पांव ,थोड़ा सब्र करले ,
दरख्तों में भी,छांव घनी हो जायेगी ।

बर्फ सी जिद को पिघलना चाहिए ,
धूप जब भी, गुनगुनी हो जायेगी ।

पास थे,उनकी कद्र कुछ भी ना थी,
फासले में कीमते ,सौगुनी हो जायेंगी ।


जब भी कहना हो,तो रहना होश में ,
बात सच की ,अनसुनी हो जायेगी ।

ये अँधेरे ,ये घुटन ,अब तोड़ भी दो,
वरना! पागल ,ज़िन्दगी हो जायेगी ।

घर से बाहर पांव ,अब रख दीजिये ,
आपसे परचित ,ज़मीं हो जायेगी ।

मोड़ लो वापस,ग़मों के सिलसिले ,
मुस्कुराती आँख में ,नमीं हो जाएगी ।

७.
 आने वाला वक्त अगर, दोहराएगा बीते लम्हें ,
उन्हें पकड़ के रख लूंगा ,जो छूट गए पीछे लम्हें ।

रफ्ता-रफ्ता उमींदों की, चादर जब बुन जायेगी ,
थोडा रूककर के सुस्तायेंगे ,यादों के मीठे लम्हें ।

माँ की उंगली पकड़ ठुमक कर ,चला करेंगे इतराके ,
आयेंगे कल बचपन की ,चंचलता के नीचे लम्हें ।

अभी वक्त है ठहर जरा तू,बतिया ले मन की बातें ,
ना जाने फिर चुप्पी ओढ़े ,आ जाएँ पीछे लम्हें ।

नवयोवन की भाषा सचमुच ,इतनी ज्यादा बदल गई ,
समझ नहीं पाते माँ-बाबा ,बच्चों के खीचे लम्हें ।

नैतिकता औ संस्कार को ,निगल रहा है परिवर्तन ,
हमने जो अरमानो से ,जी भर कर के सींचे लम्हें ।
८. 
मंजिल तो थी मेरे सामने ,पर रहा भटकाती रही ,
यूँ ही जिंदगी को ढूंढने में,जिंदगी जाती रही |

ख्वाव में होंठों से उसने ,मेरी पलकों को छुआ ,
जागने पर दो घडी तक, बेकली जाती रही |

तुम गए मौसम गए ,गए मस्तियों के दौर भी ,
श्याम के हाथों से मनो,बांसुरी जाती रही |

आरजूएं हो गईं कद से बड़ी ,मैं क्या करूँ ?
जब मुकम्बल जिंदगी हो,वो घडी जाती रही |

ये बदलता दौर है,तू कोई भी दावा ना कर ,
आप से गैरत ,हवा से ताजगी जाती रही |

न पता-कोई ठिकाना ,दर-ब-दर खानाबदोश ,
पांव के नीचे से अक्सर ही ,ज़मीं जाती रही |

वक्क्त के दामन से लिपटे सुर्ख-स्याह फलसफा ,
हम उजालों से मिले तो ,रौशनी जाती रही |

आजकल ‘अनुराग है बस एक आवारा धुआं ,
वक्त से उम्मीद ,सांसों से नमीं जाती रही ।
९.
 इस पिघलते ह्रदय में,है मिलन की आस कैसी ?
बह रहा मन अश्रु बनके ,फिर नयन में प्यास कैसी?

मौन मन उलझा उदासी की भवंर में अनवरत ,
फिर है ‘जुवां ‘आहों की ,पदचाप ,कैसी ?

कोई छेड़े स्वर, विरह की तान वीणा बेसुरी ,
छटपटाती,व्यथित ,व्याकुल ,गूंजती आवाज कैसी ।

फूल-कलियाँ रूठकर ,मंमुन्द एकाकी भ्रमर,
गुनगुनाहट ,गुन्जनों की हो गयी चुपचाप कैसी ?

चांदनी बिखरी धवल चादर ,धरातल की छटा ,
ठंडी-ठंडी वायु तन से, जहर रही है आग कैसी?

हैं सभी बंधन शिथिल ,बेबस प्रणय के ग्गेत हैं ,
चकित उन्मादित लहर में ,जग रही है रात कैसी ?

मन मुकुर में भी वही प्रतिबिम्ब ,मानहु शेष हैं ,
ये है ह्रदय की व्यक्तिगत ,बुनुयाद कैसी ।

भाव सहमे और मन की भावना भयभीत है ,
शशीकला की छवि छटा ,चितकी हुई है उदास कैसी ?

घोर तम,घनघोर तम ,घनश्याम मय ,घन-दामिनी ,
कोयलों की कूंक कटु ,काक वाक् मिठास कैसी ?

१०. 
दर्द में डूब गए,आंसुओं में बह निकले ,
दिल जो पिघला ,तो समंदर निकले |

बेवफा ‘साँस’मगर,एतबार सदियों का ,
हाँ यही सोच के ,घर से सिकंदर निकले|

माइने रोज नए गूंथती,कतरा-कतरा सीती,
ज़िन्दगी काश!नए-दौर का सफर निकले |

टूटकर आप बिखरते हैं ,या संवर जाते हैं,
जिसने हालात संभाले,वो मुकद्दर निकले|

जब भी दिखते हैं आइनों में, दरकते चेहरे ,
बद्दुआ लग गयी एहवाब,सितमगर निकले|

बख्शते आप’नहीं’सांस,घुटन क्यों होती ,
बेबजह ज़िन्दगी है,लोग बेखबर निकले |

आप अल्फाज तराशेंगे,जुबां पर जब भी,
लफ़्ज-आवाज सुनो,दोनों हमसफर निकले|
११.
 आंकलन मत कीजिये ,इस वक़्त उस उन्माद का ,
ये सीधा-सीधा, मेरे और तेरे ,बीच का संवाद था ।

तोड़कर सागर किनारा ,घुस गया है बस्तियों में ,
पी गया जो ज़िन्दगी को ,ये कौन सा तूफ़ान था ।

जागरण का दौर है मत सो,अन्धेरा ढूंढ ना ले
मशवरा है आपको, मानना ना मानना ईमान था ।

हो गई जर्जर इमारत ,खंडहर रोशन गुलिस्ताँ,
गर्दिशों के दौर थे ‘कल’हर आदमी बदनाम था ।

महफिले चलती रहीं ,चारो तरफ शानो-शबाब ,
हम तो उनसे भी मिले,जो अपने घर मेहमान था
१२.
 रात थक कर सो चुकी,मैं जागता हूँ भोर तक ,
है मेरी खामोशियों का,ये सफ़र उस शोर तक ।

लम्हां-लम्हां जोड़कर ,जीनी पड़ी जो जिंदगी ,
क्या हुआ हासिल तुम्हे ,यूँ वक़्त मेरा तोड़कर ।

लटके रहे ,रिश्ते सलीबों पे, मगर हम उम्रभर,
थे अँधेरे हमसफ़र ,उस रोशनी के छोर तक ।

जल रहा था मन मगर ,बेचैन, आँखों में नमीं ।
ये साँस ही उम्मीद बन,ले चली उस मोड़ तक ।

हवाएं रुख बदलती हैं तो ,मौसम भी बदलता ,
हम मदद लेकर चलें,इस वक़्त हर कमजोर तक ।

‘अनुराग’ पुल बन जाइये,मिल जायेंगे दोनों किनारे,
प्रेम के ये गीत गूंजे,घर,नदी,सागर,सदी के मोड़ तक। 
१३.
 मेरे इखित्यार में तो है ,मगर हांसिल नहीं है ,
सफर भी,रास्ता भी है ,मगर मंजिल नहीं है|

महज़ दस्तूर है ,मिलना-मिलाना ,दोस्ताना ,
बदलते दौर में ,कोई यकीं काबिल नहीं है ।

वो इक दिन लौट आएंगे ,मेरी उम्मीद उनसे ,
फ़कत गुमराह है,वो आदमी पागल नहीं है ।
१४. 
तू रूठेगा अगर,हम भी मनाना सीख लेंगे,
ज़मीं है प्यार में मौजूद ,अब दलदल नहीं है ।

उठा लो नाज़ तुम उनके,जो दिल से तुम्हारा हो,
चलेंगे साथ हम मिलकर ,क़दम बोझिल नहीं हैं ।

यूँ ही कोशिश रही जारी ,दिलों को जीत लायेंगे ,
हमें उनको जगाना है ,जहाँ हलचल नहीं है ।

ना हो पतवार गर’अनुराग’,तो मुश्किल भँवर है,
लहर के साथ हो लेना ,अगर साहिल नहीं है 
१५. 
जलता हुआ चिराग,हवा ने बुझा दिया ,
झूठा नकाब सच के,बयाँ पर चढ़ा दिया |

हम पूजते रहे जिसे ,भगवान् की तरह ,
कम्बखत ने साँसों पे,पहरा बिठा दिया|

कल तक ख्याल था,जिन्हें मेरे सुकून से ,
उसने ही मेरी रहा को,मुश्किल बना दिया|

मैं जानता हूँ आप भी,गुमराह हैं मगर ,
भटके हुए को फिर भी,रास्ता बता दिया |

मैं ज़िन्दगी से सामना,करने लगा हूँ जब,
तो ज़िन्दगी ने सचका,आइना दिखा दिया |

क्यों आजमा रहे हैं आप ,उस गरीब को ,
हालात ने चाह जिसे ,पत्थर बना दिया |

बड़ी दूर तक चलेंगे ,उजाले में हमसफ़र ,
‘अनुराग’ने ये सोचके ही, घर जला दिया|

मंगलवार, 6 अक्तूबर 2015

अवधेश कुमार जौहरी

परिचय:
नाम-अवधेश कुमार जौहरी
पिता- श्री हरिश्चंद्र जौहरी
जन्म -09-sept-1978
चन्द्र शेखर आज़ाद नगर ,भीलवाड़ा (राजस्थान )
संपर्क-09001712728
Mail id –avijauhari@gmail.com ,avi_jauhari@yahoo.co.in
2. शिक्षा दीक्षा
* एम.ए, एम.फिल., यू.जी.सी.नेट (हिंदी साहित्य)
* एक वर्षीय डिप्लोमा (उर्दू भाषा) मानव संसाधन मंत्रालय ,दिल्ली (भारत )
* लघु शोध- “हिंदी में ग़ज़ल की परम्परा और दुष्यंत कुमार’’
3. सम्प्रति:हिंदी व्याख्याता (विभागाध्यक्ष हिंदी विभाग )
आचार्य श्री महाप्रज्ञ इंस्टिट्यूट ऑफ़ एक्सीलेंस ,आसींद, भीलवाड़ा (राजस्थान)
4. साहित्यिक उपलब्धियाँ: अंतर्राष्ट्रीय संगठन “हिंदी दसा,दिशा और दुर्दशा’’ ग्रुप का सफ़ल संचालन .लगभग 700सदस्य .
*ग़ज़ल क्या ,क्यों और कैसे प्रकाशित पुस्तक प्रकाशित .
*हिंदी भाषा के उन्नयन के लिए समर्पित ,लेखन,परिचर्चा,और साहित्यिक गतिविधियों में सक्रिय .
*अंतर्राष्ट्रीय,राष्ट्रीय साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं और इ-पत्रिकाओं में रचनाएँ,समीक्षा,कविता,ग़ज़ल नज़्म आदि का निरंतर प्रकाशन | जिसका विवरण अधोलिखित है .
*विश्व हिंदी संस्थान,कनाड़ा से प्रकाशित “प्रयास”,और “मालती’’(अंतर्राष्ट्रीय इ –साहित्यिक पत्रिका और हिंदी साहित्य शोध पत्रिका)
*समय सृजन,साहित्य निधि (राष्ट्रीय साहित्यिक पत्रिका )
*राजस्थान पत्रिका ,दैनिक भास्कर ,उत्कर्ष मेल (राष्ट्रीय पत्र )
* “जत्र नारेषु पूज्यन्ते” एकांकी का सफ़ल लेखन और मंचन |
*ग़ज़ल संग्रह ,हिंदी व्याकरण (प्रकाशाधीन )
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1. 
कभी फुर्सत हो तो देखो , अपना गुज़रा ज़माना | 
मुहबब्त की वो बातें ,चिड़ियों का चहचहाना || 

ना थी कोई बंदिशें ,ना हीं था कोई फ़साना | 
मर्जी का ही था आना ,मर्जी का ही था जाना || 

स्कूल की वो घन्टी , अंतहीन दोस्तों की बाते | 
झूठे ही रूठ जाना , पर सच्चा था वो मनाना|| 

हर राह में थी कलीयां ,बागन था हर मुहल्ला | 
शबनम के थे ये आँसू ,कलियों का मुस्कुराना || 

लगती थी चोट जब भी ,आती थी याद अम्मा | 
वो मुस्कुराते रहना ,आँसूओं का भी छुपाना || 

अम्मा की प्यारी मूरत ,बाबूजी की वो सूरत | 
आबाद जिसके दम से था ,मेरा वो आशियाना || 

आती नहीं है गोया क्यों, अब आँगन में भी मेरे | 
बदली है क्यों फिजायें , बदला है क्यों ज़माना || 

जीवन बहुत है छोटा ,कुछ खो गया है इसमें | 
सब खोजते है अब तो ,खुशियों का ही ठिकाना || 

ख़ुद खो गया है खोजी ,ये खोज भी गज़ब है | 
चन्द कहकहों के खातिर,भटका कहाँ कहाँ ना || 

2.  
यूँ ही बेसबब दिन-रात गुज़ारा मत कीजिये | 
एहसान वक़्त का यूँ भी उतारा मत कीजिये || 

तुम्हारे ज़िगर से निकलेंगे फिर लहूँ के आँसू | 
इस कदर भी किसी को निहारा मत कीजिये || 

यहाँ पिंजरे की हकीकत से वाकिफ है परिंदा | 
किसी को भी दिखावे का सहारा मत कीजिये || 

अभी तो जाग रही है चिरागें भी उन राहों में | 
सफरे प्यार में ख़ुद को आंवारा मत कीजिये || 

वक्त की उलझन सभी उलझनों से बड़ी होती है| 
सिर्फ़ उलझे जुल्फों को संवारा मत कीजिये || 

हर अँधेरे के ज़हन में होते है उजाले का वज़ूद | 
अहसान जुगनुओं का भी नकारा मत कीजिये|| 

हम तो मुसाफिर है हमारे नसीब में राहतें कैसी | 
जो हो न सका किसी का हमारा मत कीजिये || 

ज़माने वाले तो मुहब्बत को बदनाम कहते है | 
कलम वाले ये गुनाह है दोबारा मत कीजिये ||
3. 
सियासत के खेल बड़े ही निराले होते है |
जिधर देखो उधर गड़बड़ झाले होते है ||

जिसने ज़माने का पेट भरने की कसम खाई है |
उनके बच्चों को ही रोटियों के लाले होते है ||

सियासत ने ज़ज्बातों का खून कर दिया |
सभी जुबाँ वालो के जुबाँ पे ताले होते है ||

जिन मुश्किलों से निजात हमे नहीं मिलती |
न मुश्किलों को हमने ही कहीं न कही पाले होते है ||

रंग बदलती दुनिया का दस्तूर भीअ जीब है |
झूठे का बोल बाला सच्चे के मुँह काले होते है ||

ज़माने में जो नहीं रखते है अहले- हूनर |
वो सारे सियासत के साले होते है||

बड़ा अजीब शख्स था जो सरे- राह मिल गया |
कहता है हिन्दुस्तान में बड़े ही बवाले होते है ||

अपनों की ही बंदिशों ने हमे मारा है |
वरना किसको कहते की ये हमारे घरवाले होते है ||
4. 

कैसे कैसे मंज़र देखे ।
यारों के कर खंज़र देखे ।।1

सावन के मौसम में भी 

खाली उनके झंझर देखे ।।2
लोगो में वो प्यार कहाँ ।

सर कटाते बन्दर देखे ।।3
बाहर की मत पूछ कहानी ।

इतने किरदार अंदर देखे ।।4
हरियाली की आस नहीं ।

जब देखें तब बंजर देखे ।।5
ज़ज्बातों की प्यास बड़ी है 

ऐसे प्यासे समन्दर देखे ।।6
5

कभी तय हो तो ,मंजिल की बात करें ।

कभी बात होतो ,तय मिल साथ करें ।।

बादलों की कशम्शसाजिश समझ लो ।
कच्चे घर में ही बेमौसम न बरसात कर।।

इस शहर में आदमी कम पुतले अधिक है ।
इनसे मिल के चलने में एहतियात करें ।।

कभी आओ यूं भी की मजमा सजा ले हम 
दुल्हन तुम दूल्हा मै,और सब बारात करें ।।

उम्र भी कम पड़ती हैज़माने के काम से 
कुछ लम्हे यूं ही चुरा के मिलेंबर्बाद करें ।।

तुम पूनम की चाँद हो मै सर्दी का सूरज हूँ ।
दुनिया को छोड़ो ,कहीं और दिनों रात करें ।।

कमोबेश हर शख्श परेसान है इस जहाँ से ।
क्यों न मिल के हम,खुदा से मुलाकात करें ।।
6. 

आँखों ही आँखों में यूँ न रोया करो।

कभी खुल के भी दामन भिगोया करो।।

ज़ुल्फ़ चेहरे से हटा दो ,या हटा दू मैं खुद ?
नूर के रहते इतना,ना अँधेरा करो।।

साकी मैं बन के फिर पिलाने चला।
रोक के साँस मैं मयखाने चला॥

उनके लरजते हैं आँसू लड़खड़ाते है पैर।
कमज़र्फ को शराब न पिलाया करो॥

प्रेम को खुद खुदा वाले माने खुदा।
चोट खा के भी दिल से जो नहीं है जुदा॥

हम दीवानों के महफ़िल में आते तो हो।
ज़ख्म को देख के न मुस्कुराया करो॥

दिल ने पूजा जिसे भागवान की तरह।
पेश आये वो अनजान की तरह॥

तुमसे ही रौशन हैं हम, हमारे सभी
दीप बन के जलोघर को न जलाया करो॥

जिनको ज़माने की सारी ख़ुशी मिल गयी।
दिल के गुलशन में कोई कली खिल गयी॥

आप हँसते है ,हँसाने का सही वक़्त है।
उनके दुःख परन हंसोन हंसाया करो॥

आपको जानता तो हूँ पहचानता नहीं।
जो बात दिल में थी ,कभी न कही॥

गर निकाल न सको तुम भंवर से हमेँ।
समन्दरमें लाके ,न दामन छुड़ाया करो॥